Agriculture Success Story : देश में जब कोराना काल चल रहा था, तब जहां लाखों लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है, वहीं कुछ लोगों के जिंदगी में कुछ बदलाव आये है, जिसके तहत वे अब अपने करियर में कामयाब है। दरअसल् हम अब बात कर रहे हैं, हरियाणा के भिवानी स्थिति एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे प्रमोद सहारन की लॉकडाउन ने जीवन को बदल दिया। लॉकडाउन के दौरान में सिविल इंजीनियरिंग में M.Tech प्रमोद ने अपने बचपन के शौक बागवानी को फिर से अपने जीवन में जिया। पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) का उपयोग करते हुए उन्हें इसकी बनावट और बनाने की प्रक्रिया में दिलचस्पी हुई। यह दिलचस्पी जल्द ही एक सफल व्यापार में बदल गई। इससे प्रमोद आज सालाना करीब 30 लाख रुपये कमा रहे हैं। मात्र 500 रुपये में 1 किलो केंचुए खरीदकर उन्होंने इसकी शुरुआत छोटे-से प्रयोग के तौर पर की थी। फिर अपनी प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर वह वर्मीकम्पोस्ट बनाने के काम में ही जुट गए। आज वह इस क्षेत्र में एक मिसाल बन गए हैं।
मात्र ₹500 से किया स्टार्टअप
लॉकडाउन के समय असिस्टेंट प्रोफेसर रहे प्रमोद सहारन ने पौधों के लिए स्थानीय दुकान से वर्मीकम्पोस्ट खरीदने के दौरान उनकी रुचि इसे बनाने में बढ़ी। अपने अध्ययन की शुरुआत करते हुए उन्होंने चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) से 500 रुपये में ‘आइसेनिया फीटिडा’ किस्म के 1 किलो केंचुए खरीदे, जो भारतीय मौसम में खाद बनाने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। उन्होंने केंचुओं को गाय के गोबर के साथ घर के बगीचे के एक कोने में रखा ताकि उनका विकास चक्र देखा जा सके। इस प्रक्रिया के बाद प्रमोद ने पाया कि ये केंचुए हर डेढ़ माह में दोगुने हो जाते हैं। किंतु एक दिन नल का पानी (क्लोरीन युक्त) डालने से सभी केंचुए मर गए। मगर, इस असफलता ने उन्हें केंचुओं के मल्टीप्लिकेशन, विकास और जीवित रहने की स्थितियों को समझने में सहायता मिली।

नौकरी छोड़ लगाया केंचुआ की खेती में लगाया अपना जीवन
प्रमोद के द्वारा किए गए केंचुए अध्ययन (Agriculture Success Story) की सफलता और व्यापार की क्षमता को देखकर प्रमोद ने अपनी नौकरी छोड़ दी। मार्च 2021 में उन्होंने 300 रुपये प्रति किलो की दर से 60 किलो केंचुए खरीदे। फिर उन्हें हिसार के कैमरी गांव में अपने खेत में ट्रांसफर कर दिया। उन्होंने 4 फीट चौड़े और 30 फीट लंबे पांच वर्मीकम्पोस्ट बेड बनाए। हर एक बेड पर करीब 12 किलो केंचुए और 1700 से 1800 किलो गाय का गोबर डाला गया। हर एक बेड की लागत 1600 रुपये आई (केंचुओं और गोबर पर कुल 22,000 रुपये का खर्च)। जून तक, इन पांचों बेड से 40 क्विंटल (4,000 किलो) वर्मीकम्पोस्ट तैयार हो गया। प्रमोद ने इसे औसतन 12 रुपये प्रति किलो की दर से बागवान और सब्जी उत्पादकों को बेचा। कुल रेवेन्यू 48,000 रुपये रहा। इससे 26,000 रुपये का शुद्ध फायदा हुआ। इस पहले मुनाफे ने प्रमोद को विश्वास दिलाया कि वर्मीकम्पोस्ट एक आकर्षक व्यावसायिक मौका है।
सफल होने पर कई गुना बढ़ा दिया प्रोडक्शन
अपनी केंचुआ की खेती (Agriculture Success Story) में किए गए प्रयोग से शुरुआती सफलता के बाद प्रमोद ने अपने पैतृक खेत के करीब एक एकड़ खाली पड़े भाग का उपयोग करने का अहम निर्णय लिया। उन्होंने 2021 से 2024 के मध्य अपने उत्पादन को पांच बेड से बढ़ाकर 50 और फिर 85 बेड तक पहुंचाया। आज के समय में, उनके एक एकड़ के परिसर में 120 वर्मीकम्पोस्ट बेड, प्रोसेसिंग मशीनें और एक पैकेजिंग और भंडार क्षेत्र है। एक बेड को तैयार होने में 3 माह लगते हैं। इसके बाद उसे ताजा करना पड़ता है, यानी एक बेड से साल में तीन उत्पादन चक्र लिए जा सकते हैं। इस कैलकुलेशन के मुताबिक, 120 बेड से सालाना तीन चक्रों में कुल 2700 क्विंटल (2.70 लाख किलो) वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन होता है।

हर वर्ष होती है ₹30 लाख की कमाई
पाठकों को बता दें कि, प्रमोद तैयार वर्मीकम्पोस्ट को छोटे पैकेटों (5 किलो बैग 70 रुपये और 1 किलो 15 रुपये) में बेचते हैं। उनके कुल बिक्री का मात्र 15% नर्सरी को जाता है। बाकी किसान और बागवान सीधे उनकी यूनिट से खरीदारी करते हैं। वर्मीकम्पोस्ट का औसत रेट 800 रुपये प्रति क्विंटल बैठता है। इससे उन्हें हर वर्ष करीब 22 लाख रुपये का मुनाफा होता है। इसके अतिरिक्त, वह उन किसानों को भी केंचुए बेचते हैं जो नया व्यापार स्टार्टअफ करना चाहते हैं। केंचुओं (Agriculture Success Story) का रेट मांग और मौसम के आधार पर 100 रुपये से 200 रुपये प्रति किलो के मध्य रहता है। इससे हर वर्ष 7 लाख से 8 लाख की अतिरिक्त मुनाफा होता है। इस प्रकार, प्रमोद सहारन की कुल वार्षिक आय 30 लाख रुपये तक पहुंच गई है। उन्होंने स्थानीय समाचार पत्रों में पर्चे बांटकर शुरुआत की थी। मगर, अब उनका ग्राहक आधार ‘वर्ड ऑफ माउथ’ से बढ़ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि खरीदार उत्पाद को उनकी यूनिट से अपने-आप ले जाते हैं। इससे प्रमोद को परिवहन लागत में भी बचत होती है। उनका टारगेट जल्द ही बेड की संख्या 150 तक बढ़ाना है।














