आपकी रसोई में पीतल-तांबे के पारंपरिक बर्तन है, तो आप इन बीमारियों से दूर हैं...

आज के टाइम में जहां स्टील, प्लास्टिक और कांच के बर्तनों का उपयोग बढ़ गया है, वहीं आयुर्वेद फिर से हमें हमारे पारंपरिक धातु बर्तनों की ओर लौटने की प्रेरणा दे रहा है।

पहले के समय में लोग तथा राजा-रजवाड़े सोने-चांदी के बर्तनों का इस्तेमाल करते थे, वह केवल ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं था, केवल स्वास्थ्य संरक्षण का एक माध्यम भी था।

आर्युवेदिक बुजुर्गों का कहना है कि सोना शरीर की इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। यह शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सक्षम है।

चांदी के बर्तन पित्त प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लिए अत्यंत फायदामंद माने गए हैं। चांदी के बर्तनों में खाना खाने से शरीर में ठंडक बनी रहती है और यह त्वचा संबंधी रोगों से बचाव करने में सक्षम है।

एक आर्य़ुवेदिक के मुताबिक, मिट्टी के बर्तन आज भी सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प हैं। मिट्टी में बने भोजन में पृथ्वी तत्व का संचार होता है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है। यह न केवल स्वाद को बढ़ाता है बल्कि भोजन को जहरमुक्त भी बनाने में सहायक है।

आयुर्वेद के नजरिए से तांबे के बर्तन में रातभर रखा गया पानी सुबह खाली पेट पीना अत्यंत फायदेमंद माना गया है। इससे गैस, अपच और कब्ज की समस्या दूर होती है।

तांबे में एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, जो शरीर को संक्रमणों से बचाते हैं। पीतल के बर्तन में रखा पानी पीने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और शरीर में ऊर्जा को बढ़ाती है। पीतल के बर्तन में पका भोजन पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है और शरीर में स्फूर्ति लाता है।

कांसा के बर्तन में कषाय और तिक्त रस पाया जाता है। यह कफ और पित्त दोनों का नाशक होता है। इन बर्तनों में बना भोजन नेत्रों के लिए हितकर और पाचन तंत्र को संतुलित मनाने में सहायक है। कांसा पाण्डु (एनीमिया) और कृमि रोग में भी फायदामंद होता है।

लौह के बर्तन का सेवन शरीर में रक्त की वृद्धि करता है और यकृत, श्वास, उदररोग, आमवात, क्षय जैसे रोगों को दूर करता है। यह शरीर में बल और वीर्य बढ़ाने में सहायक है।

तांबा के बर्तन घाव भरने, ज्वर, कास, श्वास, पीनस और कृमि रोगों के नाश में सहायक है। यह लेखन (वसा घटाने वाला) और लघु (हल्का पचने वाला) गुण रखता है।