दरअसल आजकल सरसों के तेल के दाम के कारण से किसानों का ध्यान सरसों की खेती की तरफ चला गया है। हजारीबाग जिले में नवंबर-दिसंबर के माह में बड़े पैमाने पर किसान बंधु सरसों की खेती लगते हैं। इस खेती से किसान बड़ी कमाई भी करते हैं।
आज के दौर में खेती करना किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। जैसा कि महंगे बीज, खाद और कीटनाशक के कारण किसानों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में खेती को फायदेमंद बनाने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना अब समय की डिमांड है।
इस विषय पर हजारीबाग के आईसेक्ट विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि इस सर्दी के मौसम में जब जिलेभर में सरसों की बुवाई स्टार्ट होने जा रही है।
किसान पारंपरिक रासायनिक खाद की जगह मुर्गी के बीट से तैयार जैविक खाद का इस्तेमाल करना। यह न केवल सस्ता विकल्प है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी लंबे समय तक बनाए रखता है।
मुर्गी के बीट में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और जिंक जैसे पौधों के लिए आवश्यक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन तत्वों के कारण फसल की जड़ें मजबूत होती हैं और उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है।
एक बार खेत में इस जैविक खाद का इस्तेमाल करने पर इसका प्रभाव करीब तीन वर्ष तक बना रहता है। मिट्टी की नमी और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता भी इस खाद से ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे फसल की वृद्धि बेहतर होती है।
मुर्गी के बीट से तैयार खाद के इस्तेमाल से रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है, जिससे किसानों को आर्थिक राहत मिलती है. साथ ही, यह पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है क्योंकि इससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब नहीं होती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से से अपील की है कि सरसों की खेती स्टार्ट करने से पहले खेतों में इस जैविक खाद का छिड़काव हल्के मात्रा में जुताई के दौरान इसे मिट्टी में अच्छी तरह मिला कर करना चाहिए।
इससे बीज अंकुरण तेज होगा और फसल की उपज में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है।